मोह नहीं, परम सत्य है जीवन का लक्ष्य | Sudhanshu Ji Maharaj

मोह नहीं, परम सत्य है जीवन का लक्ष्य | Sudhanshu Ji Maharaj

मोह नहीं, परम सत्य है जीवन का लक्ष्य

मायापति हैं घटभीतर, बाहर केवल माया

जनवरी, 2021 आखिर आ ही गया, 20 के साथ 21, वैसे 21, 20 के बाद आता है। जैसे आज के बाद कल, आज के पहले भी कल, अर्थात दो कल ने आज को घेर रखा है। गुरुदेव जी कहते हैं| आज में जियो, वर्तमान में जियो, किन्तु दुनिया के अधिकतर इंसान आज में नहीं जीते, जीते हैं वर्तमान में तो केवल बच्चे, युवा आने वाले कल अर्थात् भविष्य की योजनाएं बना-बनाकर भविष्य में जीता है और वृद्ध अपनी पुरानी बातों को याद कर-करके गुजरे कल में जीता है, और बाकी बचे जिंदगी की कल-कल, कलकल अर्थात् कलह में, उलझनों में, योजनाओं में, प्रबन्ध में, व्यवस्थाओं में, जोड़तोड़ में, साधन जुटाने में, सुख की तलाश में, रिश्तों को पालने-पोसने, सम्भालने में गुजार देते हैं|

 यही जिन्दगी का खेल उनके हिस्से में आता है। माया में उलझे रहते हैं, माया भरमाती है इन्सानों को, माया नचाती है उनको, उसी नाच में मायापति को भूल जाता है इंसान, ध्यान बाहर की ओर से जाता ही नहीं, भीतर जाता ही नहीं, जहां मायापति विराजमान है, कठोपनिषद् में यम नचिकेता को ब्रह्मविद्या का ज्ञान देते हैं, कहते हैं|

एष सर्वेषु भूतेषु, गूढोत्मा न प्रकाशते।

दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया, सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।।

कठोपनिषद 

             अर्थात् यह परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान सबके अन्तर्यामी हैं। अतः सब प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं, परन्तु अपनी माया के परदे में छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जानने में नहीं आते। जिन्होंने भगवान का आश्रय लेकर अपनी बुद्धि को तीक्ष्ण बना लिया है। वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान की दया से सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा उन्हें देख पाते हैं।

             परमपिता परमात्मा सर्वशक्तिमान, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्द, सर्वद्रष्टा, सर्वाधिपति, सबके ज्ञाता अनादि काल से सब प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं। प्रश्न केवल बाहर नहीं, क्योंकि तुम दुनिया में बसने अैर फंसने नहीं आये हो, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य उस परम में समा जाना है, जिससे तुम बिछड़ गये हो।

             वृक्ष का बीज जब तक धरती से बाहर रहता है, वह केवल धूल मिट्टी का शिकार बनकर एक दिन समाप्त हो जाता है, किन्तु वही बीज जब धरती की कोख में चला जाता है, तो वही वृक्ष बनकर बेचैन लोगों को फल, फूल, छाया और सुगंध प्रदान करता है। ऐसे ही मनुष्य जब तक बाहरी दुनिया में सुख तलाश करता रहता है, तब तक वह दुनिया की भागदौड़ में जीवन खपा कर सच्चे सुख की तलाश करते-करते उसका अन्त हो जाता है, किन्तु जो मनुष्य उसके अंदर विराजमान परमात्मा की शरण में जाता है, तो उसे सच्चा सुख व आनन्द प्राप्त हो जाता है। तो प्रश्न केवल बाहर दुनिया में फंसने और अंदर परम में बसने का है।

मन भीतर से बाहर

             सीता जी का मन जब तक तपस्वी राम जी के साथ जुड़ा रहा, वह प्रसन्न रहीं और इन्हें वनवास के कष्टों का एहसास नहीं हुआ, किन्तु जहां उनका मन बाहरी जगत अर्थात् स्वर्ण मृग के साथ जुड़ा, वहीं से उनकी विपत्तियों का पहाड़ टूटने लगा, उन्हें रावण उठाकर ले गया, पति से विलग हो गईं और रावण की कैद में कई कष्ट भोगे। एक महारानी को कैदी की तरह जीवन बिताना पड़ा। क्यों? क्योंकि मन भीतर से बाहर को चला गया।

             हम सब जानते हैं कि पर्वतों से निकली नदियों की यात्र समुद्र तक ही होती है। वे निकास के उपरान्त अपना उद्देश्य निश्चित कर लेती हैं, रास्ते में कठिनाईयां आने पर भी रुकती नहीं हैं। उसी भांति प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य निश्चित कर लेना चाहिए। उद्देश्य है भगवद् प्राप्ति, परमसत्य में समा जाना, जीवन की यात्र में भौतिक जगत को ऐश्वर्य को भोगो, संसार के सुखों का आनन्द लो, किन्तु अन्तिम दृष्टि उस परमसत्ता पर, जो सारे विश्व का, सभी ब्रह्माण्डों का अधिपति है।

मनुष्य का ध्यान जब तक स्थूल जगत में रहता है, वह इन्द्रियों के दबाव में, उनकी जकड़ में काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि कल्मषों के थपेड़ों को झेलता अपने जीवन को दुःख में व्यतीत करता है। किन्तु जब वह स्वयं भौतिक जगत से ईश जगत की ओर चल पड़ता है, उसके जीवन में आनन्द की रश्मियों की रोशनी आनी प्रारम्भ हो जाती हैं। उपनिषदों, गीता आदि पवित्र ग्रंथों में यही संदेश है कि माया में मत उलझे रहो, संसार को भोगो, किन्तु अंतिम नजर, ध्येयदृष्टि केवल और केवल मायापति पर रहे।

 

3 Comments

  1. ताराचंद जांगिड़ पुणे says:

    जय हो सदगुरु देव महाराज शुक्रिया बहुत बहुत शुक्रिया भागयशाली महशुश कर रहे हैं औम गुरुवै नम औम नमो भगवते वासुदेवाय नम

  2. ताराचंद जांगिड़ पुणे says:

    जय हो सदगुरु देव महाराज शुक्रिया बहुत बहुत शुक्रिया भागयशाली महशुश कर रहे हैं औम गुरुवै नम औम नमो भगवते वासुदेवाय नम

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