देश के जनमानस से अपना गौरव मांगते सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पर्व | Sudhanshu Ji Maharaj

देश के जनमानस से अपना गौरव मांगते सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पर्व | Sudhanshu Ji Maharaj

स्वतंत्रता दिवस

भारत देश पर्व-त्योहारों द्वारा समाज में शांति, समन्वय, संवेदनशीलता एवं जीवन में प्रेम, दया, करुणा की स्थापना के लिए जाना जाता है। यहां का हर व्यक्ति अपने एवं अपनों के बीच भावनात्मक संतुलन के लिये पर्व-त्योहार, सामूहिक सत्संग, सामूहिक साधना के अवसर खोजता व जीवन एवं समाज के बीच सदियों से नव उल्लास, नई ताजगी, नई सोच, नये संकल्प जगाकर जीवन को खुशहाल करता आ रहा है। सुयोग है कि देशवासियों के लिए सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दोनों प्रकार के पर्वों का योग इस अगस्त माह में बन रहा है ‘‘रक्षा बंधन’’ सांस्कृतिक पर्व और ‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ राष्ट्रीय पर्व।

स्वतंत्रता दिवस

इक्कीसवीं सदी का भारत 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है

यह इक्कीसवीं सदी का भारत है, हम 75वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। देश को लगभग आठ दशक हो गये आजाद हुए पर गहराई से विश्लेषण करें तो हम आंतरिक सोच व मानवीय चेतना की दृष्टि से आज भी जहां थे, लगता है वहीं खडे़ हैं। यद्यपि विज्ञान ने काफी प्रगति की, स्थान से स्थान की दूरियां जरूर कम हुईं, परन्तु व्यक्ति के दिलों की दूरियां कम करना अभी शेष है।

चिकित्सा जगत में क्रांति हुई, सर्जरी से लेकर इसकी आधुनिक तकनीक में इजाफा हुआ, लेकिन मनुष्य आज भी समुचित चिकित्सकीय सुविधाओं के बिना जीवन की डोर खो रहा है। धर्म की दृष्टि से शाखा-प्रशाखाओं में काफी वृद्धि हुई, लेकिन मनुष्य व मनुष्य के बीच के मन की दूरी मिटाने में धर्म आज भी बहुत पीछे है। आज भी धर्म मनुष्य के अन्याय, अभाव, अत्याचार, अज्ञान, अंधकार, मूढ़मान्यताओं को दूर नहीं कर पा रहा।

समृद्ध विज्ञान से हम सब स्वर्णिम सुखद भविष्य के लिए आशान्वित, स्वस्थ नेकनियति एवं ईमानदारी से भरे समाज की संरचना कहाँ  कर पा रहे हैं? आज भी भूख एक बड़ी समस्या है। भाषा, भूषा, भोजन, भजन के नाम पर व्यक्ति टूटता, बंटता दिख रहा है। विश्व में हिंसक-निर्दयी सत्ताधारियों के क्रूर हाथों में आणविक शक्तियां ताण्डव नाच आज भी कर ही रही हैं।

मानसिक चिकित्सा कौन करेगा?

आखिर मानव मन में व्याप्त तनाव, चिंता, भय, निराशा, टूटन, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, क्लेश, गलाकाट प्रतिस्पर्धा की भावनात्मक मानसिक चिकित्सा कौन करेगा? यह बड़ा प्रश्न है। इसके बिना स्वतंत्रता दिवस हो अथवा रक्षाबंधन मनाना दोनों खाना पूर्ति ही कहे जायेंगे। वैसे इस देश में हमारे ऋषियों-संतों द्वारा निर्धारित मानक अनुसार दो क्रांतियाँ  समान चलती आयी हैं, एक व्यक्तिगत जीवन स्तर निर्माण, दूसरी समाज व राष्ट्रीय निर्माण को लेकर।

सदियों से यहां का व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर आंतरिक जीवन में अपनी मनुष्यता को पा लेने के लिये संघर्षशील रहा, तो दूसरी ओर वह व्यापक लोकहित में समाज के सुख-दुःख को दूर करने हेतु सतत तत्पर रहा। इसके लिए उसे व्यवस्था से लेकर सत्ता में बदलाव जैसी चुनौती क्यों न स्वीकार करनी पड़ी हो। उसके हर बदलाव का लक्ष्य तक शांति, आनंद, अंतिम व्यक्ति को न्याय कैसे पहुंचाया जाये। पर ये मानक जरूर कमजोर हुए हैं।

ऐसे में भले ही हम पर्वों के उत्सव कितने सभ्यता के साथ क्यों न मनाते हों। भले रक्षाबन्धन के दिन भाई-बहिन के पवित्र प्रेम-स्नेह का महान त्योहार कहकर बहन अपने भाई के स्वस्थ जीवन और दीर्घायु की कामना के साथ रक्षा सूत्र बांध ले। परन्तु परस्पर नर-नारी में पवित्र दृष्टि की अंतःकरण में स्थापना के अभाव में कैसे इसे सफल कह सकते हैं।

भ्रूणहत्या, लिंग भेद से लेकर लुटती-पिटती नारी को देखकर कैसे अंतःकरण पर्व की खुशी को स्वीकारने के लिए तैयार हो सकता है। कहते हैं कि रक्षाबंधन के दिन बहन प्रेम से अपने भाई को तिलक लगाती, उसकी आरती उतारती और शुभकामना के साथ भाई की कलाई पर राखी बांधती है। भाई भी बहन के सम्मान को लेकर उसे आश्वस्त करता है। लेकिन जब अगले ही पल देश में कहीं इस सूत्र के अन्दर छिपा हुआ पवित्र प्रेम तथा त्याग का अविस्मरणीय बंधन तार-तार होते देखा जाता है, तो यह पर्व मनाना बेमानी लगता है।

यज्ञोपवीत

इसीप्रकार इसी माह गुरुकुलों में नव प्रवेशी विद्यार्थी को यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कराने की परम्परा है। गुरुकुलों में इस श्रावणी पर्व के अवसर पर नए प्रविष्ट विद्यार्थियों का वेदारम्भ संस्कार भी किया जाता है। जिससे वह ज्ञान पाकर इस धरा को पवित्र, स्वस्थ, न्याय-नीति-साहस के बल पर हराभरा रखे, परन्तु जब कटते वृक्ष दिखाई देते हैं, तो हृदय जरूर दहलता है। आखिर इन मानकों को जन जन के बीच जगाये बिना कैसे हम इन पर्वों को मनाना सफल मान सकते हैं।

आखिर जनमानस के मन-मस्तिष्क हृदय में जिस शांति, संवेदना, दया, करुणा की स्थापना करना हम नागरिकों का कर्तव्य है, उस दायित्व को कौन पूरा करेगा? यह प्रश्न बार-बार उठना ही चाहिए। वास्तव में राष्ट्रीय चेतना इन सबकी सामुहिक अभिव्यक्ति ही तो है। ऐसे में राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त का वार्षिक महोत्सव भी अपने लक्ष्य में पूर्ण कैसे कहा जा सकता है।

विश्वगुरु की प्रतिष्ठा प्राप्त करना

‘‘शहीदों  का स्वप्न केवल अंग्रेजों को भगाकर सत्ता हांसिल करना मात्र नहीं था, अपितु उस सत्ता एवं स्वतंत्रता के सहारे उपरोक्त सभी लक्ष्यों को पूरा करते हुए गौरवपूर्ण भारत का निर्माण करना था, जिससे भारत को पुनः विश्वगुरु की प्रतिष्ठा दिलाई जा सके। स्वतंत्रता संघर्ष में योद्धाओं ने इन्हीं संकल्पों के साथ अपने प्राणों की आहुतियां दीं। सेवा एवं संघर्ष की जो परम्परा भगवान श्रीराम-श्रीकृष्ण के काल से चली आ रही थी।

गांधी, सुभाष, लक्ष्मीबाई, शहीद भगतसिंह, आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल सहित स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों वीरों ने उसी के संकल्प-साहस के साथ देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर देश को स्वतंत्र कराया।’’ जरूरत है स्वतंत्रता दिवस पर हम सब मिलकर शहीदों के सपनों के अनुरूप देश को गढ़ने हेतु समीक्षा करें। जिससे देश में शांति के पथ-प्रदर्शक सच्चे सेवक, लोक सचेतक, खड़े हों और देश में सच्ची शांति, आनन्द-प्रेम का मार्ग प्रशस्त हो तथा भारत भूमि पुनः वह गौरव पा सके, जिससे सांस्कृतिक व राष्ट्रीय पर्व मनाना सार्थक हो सके।

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