गौ माता! तेरे कौन-कौन से  गुण गाऊँ | गोवत्स द्वादशी | गोपाष्टमी | विशेष

गौ माता! तेरे कौन-कौन से  गुण गाऊँ | गोवत्स द्वादशी | गोपाष्टमी | विशेष

साक्षात् वेद है भारतीय गाय

साक्षात् वेद है भारतीय गाय

मारर्कन्डेयपुराण में भारतीय गाय को साक्षात् वेद कहा गया है। इसके अनुसार सम्पूर्ण मानवता का कल्याण गाय द्वारा सम्भव है। क्योंकि गाय की पीठ साक्षात ऋग्वेद, धड़ यर्जुवेद, मुख सामवेद, ग्रीवा इष्टापूर्ति सत्कर्म, रोम साधु सूक्त है, इसके मल मूत्र तक में शांति और पुष्टि समाई है। इसलिए जहां गायें रहती हैं, वहां के लोगों के पुण्य कभी क्षीण नहीं होते। गौ भक्त को गाय पुण्यमय जीवन देती है। गौ सेवा को इसीलिए सभी संतों-ऋषियों ने प्रोत्साहित किया है। शास्त्रें में गौ माता को साक्षात यज्ञरूप बताया गया है, मान्यता है कि इसमें 33 करोड़ देवताओं का निवास है। जिस प्रकार यज्ञ कुण्ड में सदसंकल्प भाव से हवन सामग्री की मंत्र आहुतियाँ समर्पित करने से देवशक्तियाँ आशीर्वाद की वर्षा करती हैं, ठीक उसी प्रकार गौ माता को हरा चारा खिलाने, सेवा करने से देवता सुख, सौभाग्य, यश, कीर्ति, श्रीबृद्धि कर सेवक को मनचाही संतान आदि का आशीर्वाद देते हैं।

दूध, घी, छाछ, गोमूत्र, गोबर करती है दान

गौमाता को साक्षात् यज्ञ स्वरूपा की मान्यता है। वह  सदैव अपने उत्पादों के दान से यज्ञ ही तो करती है। वह दूध, घी, छाछ, गोमूत्र, गोबर आदि देकर जीवन से लेकर प्रकृति तक सबका पोषण करती है। जबकि अपने पोषण के लिए लेती तो मात्र कुछ अंश है।

अपनी असीम संवेदनशीलता के कारण यह धरा पर चलती फिरती माँ स्वरूप भी मानी जाती है। पवित्रता के कारण इसके सानिध्य में निवास करने वाले लोगों का आध्यात्मिक विकास होते देखा जाता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में नित्य प्रातः व सायंकाल इन्हें प्रणाम करने, इन्हें सेवा से संतुष्ट रखने का विधान है।

गौ माता त्याग-पवित्रता की प्रतिमूर्ति

गौ माता त्याग-पवित्रता की प्रतिमूर्ति है, इसके बछडे़, बैल आदि गर्मी-सर्दी भूख प्यास सहते हुए भी सबके लिए अन्न उत्पादन करते हैं। सम्पूर्ण गौवंश मानव के लिए विश्वास का प्रमाण है। यह जहां भी रहती है, वह परिवार कभी भूखों नहीं मर सकता। हमारी देशी गायों के दुग्ध में मनुष्य के शरीर बल, मानसिक बल एवं आत्मिक बल की पुष्टि की सर्वाधिक शक्ति होती है। देशी गाय का गोबर, गौमूत्र जिस परिवार में उपयोग होता है और गाय की सेवा होती है, वहां निर्धनता एवं दरिद्रता सहज में मिट जाती है। इसीलिए किसी भी परिस्थिति में गौ सेवा की मान्यता है। भय से घिरी, कींचड़ व जल में फंसी, गाय को बचाने की मान्यता हमारी ग्रामीण परम्परा में आज भी है। अनेक समुदायों में गाय की रक्षा, पूजा और सेवा आदि आज भी अपनी सगी माता के समान ही की जाती है। हमारे पूर्वज गौ का पालन करना तथा उसकी रक्षा करना अपना परम सौभाग्य समझते थे। गौ के शरीर में देवी-देवताओं के निवास, उत्पत्ति की आध्यात्मिक और कल्याणकारी कथायें अनेक रूपों में मिलती हैं। जो गाय की महत्ता साबित करती हैं।

गौ माता के पूजन एवं सेवा से भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त होता है

कहते हैं एक बार ब्रह्माजी अपने एक मुख से अमृत पी रहे थे, उसी समय उनके दूसरे मुंह से अमृत फेन निकला और इससे धरा पर ‘सुरभि’ नामक गाय की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार दक्ष प्रजापति की पुत्रियों में ‘सुरभि’ को गौ माता का स्वरूप बताया जाता है। सुरभि अर्थात सुनहरे रंग की गाय, जिसके दूध से ‘क्षीर सागर’ बनने की मान्यता है। प्राचीन काल से आर्यों के बीच गायों के महत्व का वर्णन चला आ रहा है, गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को ‘गौओं में ‘कामधेनु’ बताया। शास्त्र मत है कि-धन की देवी लक्ष्मी इस धरा पर सबसे पहले गाय के रूप में ही आयीं और उन्हीं के गोबर से ‘बिल्व’ वृक्ष की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार अनन्त महिमा वाली इस गौ माता के पूजन एवं सेवा से भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त होने का विधान बताया गया है।

गायें सदा पुष्टि की कारण, माँ लक्ष्मी की मूल हैं। देवताओं के लिए वे सर्व उत्तम हविष्य (घृत) प्रदान करती हैं, स्वाहाकार आदि भी गौओं पर ही अवलंबित हैं। इसीलिए गायों में यज्ञों की प्रतिष्ठा कही गयी है। जो सौ गायों की सेवा-पोषण करते हुए नित्य अग्निहोत्र करता है, उसकी पीढ़ियाँ सुख-सौभाग्य के साथ आरोग्यमय जीवन बिताती हैं। जो व्यक्ति गाय को सर्दी-गर्मी से बचाने, शुद्ध जल-आहार आदि से पोषण देता है, उसे ब्रह्मलोक जैसा सुख मिलता है। जिस घर में गौ के घृत से हवन होता है उस घर में देवता निवास करते हैं। इसप्रकार गाय धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वगुण सम्पन्न प्राणी है।

विशेष सूचना

विश्व जागृति मिशन ‘आनन्दधाम’ में ‘कामधेनु गौशाला’ सहित देश के विविध मिशन के विभिन्न मण्डलों की छः गौशालाओं में गायों की सेवा होती है। गुरुदेव की ऋषिप्रणीत परिकल्पना का एक जीवन्त स्वरूप है

गौसेवा अभियान। आनन्दधाम तपोभूमि की गौशाला में लगभग 100 देसी गीर प्रजाति की गायें हैं। इन गौवों का सेवा संवर्धन, भरण-पोषण दैनिक व्यवस्था में शामिल है। आश्रम की ओर से सभी गायों को नित्य शुद्ध दलिया दिया जाता है। सामान्य काल में गौ साधक अपने हाथों से इन गायों को दलिया और गौ ग्रास खिलाकर पुण्य के भागीदार बनते आ रहे हैं। गौसेवा के इस पुण्य से गौसाधक के परिवारी जनों को भी सुख-समृद्धि एवं आत्म कल्याण का लाभ मिलता है। अतः आप भी गुरुधाम की गौशाला में गौ सेवा यज्ञ के लिए अपने धन का एक अंश लगायें, जीवन में गुरुकृपा पायें, सुख-सौभाग्य जगायें।

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